ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने ही गढ़ में कैसे मात खा गए

50 के दशक तक ग्वालियर के सिंधिया राज घराने के 'समर कैपिटल' के तौर पर मशहूर रहा शिवपुरी शहर आज 2019 की गर्मियों में 46 डिग्री पर तप रहा है. शहर में प्रवेश करते ही चारों ओर चक्कर लगाते पानी के टैंकर ध्यान खींचते हैं.

29 नंबर वार्ड के सइसपुरा मोहल्ले में सड़क के किनारे खड़े एक टैंक से मटके में पानी भरते स्थानीय नागरिक अजय सिंह बताते हैं कि शहर में लंबे वक़्त से पानी की समस्या रही है.

"यहां पानी का बड़ा संकट है. कई महीनों से तो हम लोगों को पीने का पानी भी खरीदकर पीना पड़ रहा है. इसी वजह से लोग ग़ुस्से में हैं. तभी इस चुनाव में पहली बार महाराज भी हार गए."

शिवपुरी शहर मध्यप्रदेश के गुना लोकसभा क्षेत्र का संसदीय मुख्यालय है और जिन 'महाराज' का ज़िक्र अजय ने अपनी बात में किया वह सिंधिया घराने के वारिस और गुना लोकसभा क्षेत्र के पूर्व सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया हैं.

2002 से 2014 तक लगातार चार बार गुना लोकसभा सीट से जीतते आ रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया अपनी पाँचवीं चुनावी लड़ाई भारतीय जनता पार्टी के कृष्णपाल सिंह यादव से 1,25,549 वोटों के भारी अंतर से हर गए.

2019 के चुनावों में गुना लोकसभा सीट के नतीजे मध्यप्रदेश कांग्रेस के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर भी पार्टी के लिए निराशा का कारण बन कर उभरे हैं. ख़ास तौर पर इसलिए क्योंकि इस सीट को सिंधिया परिवार का गढ़ माना जाता रहा है.

मध्यप्रदेश के अस्तित्व में आने के बाद से ही विजया राजे सिंधिया, माधव राव सिंधिया और ज्योतिरादित्य सिंधिया समेत सिंधिया परिवार के अलग-अलग सदस्य इस सीट से जीतते रहे हैं. साथ ही ज्योतिरादित्य सिंधिया की यह हार इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आज़ादी के बाद यह ग्वालियर राजघराने या 'महल' के किसी व्यक्ति की पहली चुनावी हार है.

लेकिन सिंधिया परिवार के गढ़ में पहली बार सेंध लगाने वाली भाजपा की इस जीत और ज्योतिरादित्य सिंधिया की इस ऐतिहासिक हार के कारणों पर आने से पहले मध्यप्रदेश की राजनीति में सिंधिया परिवार के महत्व को समझना ज़रूरी है.

शिवपुरी शहर में मौजूद सिंधिया परिवार के पुरखों की याद में बनी 'छतरी' के प्रबंधन अधिकारी अशोक मोहिते रजवाड़ों के समय के पुराने दस्तावेज़ दिखाते हुए बताते हैं, "इस राजघराने की शुरुआत 1740 के आसपास राणो जी सिंधिया ने की थी. वह मराठा हिंदू योद्धा थे और सबसे पहले मालवा क्षेत्र पर फ़तह कर उन्होंने उज्जैन को अपनी पहली राजधानी बनाया."

"फिर 1800 तक आते-आते, शाजापुर से होते हुए ग्वालियर सिंधिया परिवार की राजधानी हो गई. तब से लेकर आज़ादी तक, शिवपुरी, शयोपुर और गुना का यह पूरा क्षेत्र ग्वालियर राजघराने के सिंधिया परिवार की रियासत का हिस्सा था. पहले शिवपुरी में बहुत हरियाली और कई झरने-तालाब हुआ करते थे. तब सिंधिया परिवार यहां अपने गर्मियों के दिन बिताने आता था".

आज़ाद भारत में सिंधिया परिवार की राजनीतिक भूमिका के बारे में बात करते हुए अशोक कहते हैं, "ग्वालियर राजघराने के महाराज जीवाजी राव सिंधिया आज़ादी के बाद बने 'मध्य भारत' के पहले राजप्रमुख थे. फिर 1956 के बाद मध्यभारत का विलय करके मध्यप्रदेश बनाया गया."

"इसके बाद साल 1957 में नए मध्यप्रदेश में जो पहला चुनाव हुआ, उसमें जीवाजी महाराज की पत्नी राजमाता विजया राजे सिंधिया ने इसी गुना लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीत गयीं. तब से ही यह परिवार इस सीट पर जीतता रहा है."

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